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समस्तीपुर में शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल, 161 नवसृजित प्राथमिक विद्यालय जमीन और भवन से वंचित

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समस्तीपुर जिले में 161 नवसृजित प्राथमिक विद्यालयों के पास न जमीन है न भवन। शिक्षा विभाग ने इन्हें नजदीकी स्कूलों से टैग कर संचालन की योजना बनाई है।

समस्तीपुर/आलम की खबर:समस्तीपुर जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। जिले में ऐसे 161 नवसृजित प्राथमिक विद्यालय सामने आए हैं, जिनके पास न तो अपनी भूमि उपलब्ध है और न ही स्थायी भवन का कोई इंतजाम है। यह स्थिति न केवल शिक्षा विभाग की योजनाओं पर प्रश्न खड़े करती है, बल्कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा सुविधाओं की हकीकत को भी उजागर करती है।

जानकारी के अनुसार ये सभी विद्यालय लंबे समय से अस्थायी व्यवस्था के सहारे किसी न किसी प्रकार से संचालित हो रहे हैं। कई जगहों पर इन स्कूलों को सामुदायिक भवन, अन्य सरकारी विद्यालयों के परिसर या अस्थायी ढांचों में चलाया जा रहा है। इससे बच्चों की पढ़ाई के माहौल पर भी असर पड़ रहा है और शिक्षकों को भी कई प्रकार की व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जिला स्तर पर उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र समस्तीपुर प्रखंड है, जहां अकेले 34 विद्यालय ऐसे हैं जो भूमिहीन और भवनहीन श्रेणी में आते हैं। इसके बाद अन्य प्रखंडों में भी दर्जनों स्कूल इसी समस्या से जूझ रहे हैं। कुल 161 चिन्हित विद्यालयों में से अब तक केवल 96 विद्यालयों के लिए किसी न किसी रूप में भूमि की व्यवस्था हो पाई है, जबकि शेष अभी भी बुनियादी ढांचे के इंतजार में हैं।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जिले के सभी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे विद्यालयों की पहचान कर ली गई है और उन्हें सुरक्षित एवं व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए विशेष योजना पर काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी बच्चे की पढ़ाई प्रभावित न हो और उन्हें एक सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिल सके।

नजदीकी विद्यालयों से टैग करने की तैयारी

जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (प्रारंभिक शिक्षा एवं सर्व शिक्षा अभियान) के कार्यालय से जारी निर्देश के अनुसार सभी भूमिहीन और भवनहीन विद्यालयों को नजदीकी सरकारी विद्यालयों से टैग (संबद्ध) कर संचालित करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इस कदम के तहत ऐसे स्कूलों का प्रशासनिक रूप से विलय या संचालन साझा व्यवस्था के तहत किया जाएगा, ताकि बच्चों को एक निश्चित स्थान और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें।

अधिकारियों के अनुसार यह कदम अस्थायी समाधान के रूप में लिया जा रहा है, जब तक कि स्थायी भूमि और भवन की व्यवस्था नहीं हो जाती। इससे पहले भी राज्य स्तर पर कई विद्यालयों का संविलियन किया गया था, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण कुछ स्कूलों को इससे बाहर भी रखा गया था।

शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत उजागर

यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। जहां एक ओर सरकार हर बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कई स्कूल ऐसे हैं जो खुद ही बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

ग्रामीण इलाकों में अभिभावकों के बीच भी इस स्थिति को लेकर चिंता बढ़ रही है। कई लोग मानते हैं कि बिना स्थायी भवन और संसाधनों के बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है और शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होती है। शिक्षकों का भी कहना है कि अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाई कराना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

भूमि आवंटन और भवन निर्माण की जरूरत

शिक्षा विभाग अब इस पूरी स्थिति की विस्तृत समीक्षा कर रहा है ताकि भविष्य की योजना तैयार की जा सके। इसमें यह देखा जा रहा है कि किन विद्यालयों को जल्द भूमि उपलब्ध कराई जा सकती है और किन स्थानों पर नए भवनों का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर किया जा सकता है।

इसके साथ ही उन विद्यालयों की भी पहचान की जा रही है जिनका नाम सूची में शामिल नहीं है, लेकिन वे वास्तविक रूप से भूमिहीन या भवनहीन हैं। इस प्रक्रिया का उद्देश्य जिले में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और मजबूत बनाना है।

भविष्य की योजना और उम्मीदें

अधिकारियों का दावा है कि आने वाले समय में प्रत्येक विद्यालय को एक स्थायी ढांचा उपलब्ध कराने की दिशा में काम तेज किया जाएगा। सरकार की कोशिश है कि किसी भी बच्चे की पढ़ाई संसाधनों की कमी के कारण बाधित न हो।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टैगिंग या विलय ही स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि वास्तविक समस्या का समाधान भूमि आवंटन और भवन निर्माण में ही छिपा है। यदि इस दिशा में तेजी से कदम उठाए जाते हैं तो ही शिक्षा व्यवस्था को मजबूत आधार मिल सकता है।

समस्तीपुर की यह स्थिति एक बड़ी तस्वीर पेश करती है, जहां शिक्षा के विस्तार के बावजूद बुनियादी ढांचे की कमी अब भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक विकास से भी जुड़ा हुआ है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

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